गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 206

अतिक्रमण आदि के लिए शास्ति (1) कोई व्यक्ति जो

(क) गांव की किसी सार्वजनिक सड़क (चकरोड सहित ), पथ या सामान्य भूमि का अतिक्रमण करता

है या उसके उपयोग में बाधा डालता है, या

(ख) उप जिलाधिकारी द्वारा धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश या निदेश का पालन करने में विफल रहता है, या

(ग) तहसीलदार द्वारा धारा 25 या धारा 26 के अधीन किए गए किसी आदेश या निदेश का पालन करने में विफल रहता है, या

(घ) धारा 42 या धारा 48 के अधीन किए गए किसी आदेश का पालन करने में विफल रहता है: जुर्गाना का दायी होगा जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट किसी गागले में एक हजार रुपये से कम नहीं होगा और दस हजार रूपये से अधिक नहीं होगा और किसी अन्य गागले में पाँच सौ रुपये से कम नहीं होगा और पाँच हजार रुपये से अधिक नहीं होगा।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यक्ति से यथा स्थिति उप जिलाधिकारी या तहसीलदार द्वारा अपेक्षा की जा सकती है कि वह पन्द्रह हजार रुपये से अनधिक ऐसी धनराशि, जिसे संबंधित अधिकारी ऐसे कार्य या विफलता की पुनरावृत्ति से प्रविरत रहने के लिये ठीक समझे का बन्धपत्र निष्पादित करें।


रविवार, 8 दिसंबर 2024

राजस्व लेखपाल उपेक्षित कर्मचारी

लेखपाल: सरकारी तंत्र का उपेक्षित श्रमिक

लेखपाल का जीवन संघर्षों और उपेक्षाओं से भरा हुआ है। लेखपाल ही प्रशासन की रीढ़ की हड्डी है।राजस्व व्यवस्था का आधार होते हुए भी वह सरकारी मशीनरी के सबसे उपेक्षित और शोषित कर्मचारियों में से एक है। उसका काम केवल दफ्तर की फाइलों तक सीमित नहीं है—वह खेत-खलिहानों में धूल-मिट्टी से जूझता है, विवादित सीमाओं को हल करता है, और आपदाओं में लोगों की मदद के लिए बिना रुके दौड़ता है। फिर भी, उसे "नॉन-टेक्निकल" पद कहकर उसका हर श्रम, हर तकनीकी कौशल, और उसकी समर्पित सेवा का मज़ाक बनाया जाता है। यह लेखपालों की उस दर्दनाक वास्तविकता की कहानी है, जो अनदेखी की परतों में दबकर तिल-तिल घुट रही है।




 काम का बोझ और जीने की मजबूरी

1. सीमांकन: जान को जोखिम में डालकर काम
विवादित भूमि के सीमांकन में लेखपालों को अक्सर स्थानीय दबाव और गालियों का सामना करना पड़ता है। कई बार मारपीट और हिंसा का खतरा भी मंडराता है। लेकिन सुरक्षा के नाम पर सरकार आंखें मूंदे रहती है। उन्हें अकेले ही हर चुनौती से निपटना पड़ता है—ना कोई सुरक्षाकर्मी, ना कोई सहयोग।


 2. आपदा के समय पहला और आखिरी सिपाही
बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि जैसी आपदाओं में लेखपाल सबसे पहले मोर्चे पर होता है। पानी से भरे गांवों और खेतों में घुटनों तक कीचड़ में डूबकर सर्वेक्षण करता है। राहत कार्य की रिपोर्टिंग से लेकर नुकसान का आकलन तक सब कुछ उसी के कंधों पर होता है। मगर उसके हिस्से में न कोई प्रशंसा आती है, न कोई अतिरिक्त भत्ता।


 3.. छुट्टी का सपना: परिवार से दूर, काम के बोझ तले दबे
लेखपाल के लिए छुट्टी लेना लगभग असंभव है। हर विभाग को उसकी जरूरत है—चुनाव में ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं का प्रचार। वह दिन-रात प्रशासन का बोझ ढोता है, लेकिन बदले में बस तिरस्कार और थकान पाता है। परिवार से दूर रहना उसकी नियति बन चुकी है, और निजी जीवन केवल एक सपना बनकर रह गया है।


 4. तकनीकी कौशल, मगर मान्यता नहीं
लेखपाल को डिजिटल रिकॉर्ड संभालने होते हैं, जीपीएस और अन्य आधुनिक उपकरणों से काम करना पड़ता है। लेकिन इन सबके बावजूद उसे "नॉन-टेक्निकल" घोषित करके उसका हक छीन लिया गया है। अगर उसका पद तकनीकी मान लिया गया, तो वेतन और प्रमोशन में सुधार करना पड़ेगा—लेकिन सरकारी तंत्र के लिए उसकी मेहनत का मूल्य देना आसान नहीं है।





 लेखपाल का नॉन-टेक्निकल दर्जा: तंत्र की चालाकी 

लेखपाल के पद को जानबूझकर नॉन-टेक्निकल श्रेणी में रखा गया है ताकि उसकी मेहनत का उचित मूल्य न देना पड़े। इसका मतलब है कि:

 1. वेतन में सुधार से बचना: टेक्निकल घोषित करने पर लेखपाल का वेतनमान और भत्ते बढ़ाने होंगे। इससे सरकार के खर्चे बढ़ जाएंगे, जो उसे मंजूर नहीं।


2. पदोन्नति की संभावनाएं रोकना: यदि इसे तकनीकी पद घोषित किया गया, तो पदोन्नति की नई संभावनाएं खुलेंगी। मगर तंत्र चाहता है कि लेखपाल उसी पद पर जीवनभर घिसता रहे।


3. हर विभाग का बेगारी मजदूर बनाए रखना: टेक्निकल बनने के बाद लेखपाल को गैर-जरूरी कामों में लगाना कठिन होगा। यही कारण है कि प्रशासन उसकी मेहनत को मान्यता देने से कतराता है।






लेखपाल: न सम्मान, न सुरक्षा, न सुविधा

लेखपाल न केवल प्रशासन का हर काम करता है, बल्कि हर मौके पर बलि का बकरा भी बनता है। जब भी कोई गड़बड़ी होती है, उसकी नौकरी खतरे में आ जाती है। ऊपर से अधिकारियों का अपमान और विभागीय दबाव उसे मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देता है। वह न तो अपने बच्चों को अच्छा समय दे पाता है, न खुद के जीवन में कोई सुख देख पाता है। उसके सपने सरकारी फाइलों में दम तोड़ देते हैं, और उसकी मेहनत का कोई मोल नहीं रह जाता।




निष्कर्ष: कब मिलेगी लेखपालों को इंसाफ?

लेखपालों का जीवन संघर्ष, दर्द, और उपेक्षा की कहानी है। वे हर रोज़ अपने आत्मसम्मान को कुचलते हुए प्रशासन का बोझ ढोते हैं, मगर सरकार की नजर में वे महज "नॉन-टेक्निकल" कर्मचारी हैं। अगर उनका हक उन्हें नहीं दिया गया, तो यह न केवल लेखपालों के साथ अन्याय होगा, बल्कि पूरे तंत्र की निष्क्रियता का प्रमाण भी। समय आ गया है कि उनकी मेहनत को पहचाना जाए, उनका दर्जा बदला जाए, और उन्हें वह सम्मान और सुविधाएं दी जाएं, जिनके वे हकदार हैं।

लेखपालों की यह पीड़ा कोई व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की विफलता है। अगर सरकार ने अब भी उनकी आवाज़ नहीं सुनी, तो यह घाव और गहरे होंगे—और शायद फिर उन्हें भरना मुमकिन न हो।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 220

भूमि पर प्रवेश करने की शक्ति इस संहिता के अधीन नियुक्त कोई अधिकारी, ऐसी निबन्धनों और शर्तो, जैसी विहित की जाय के अधीन रहते हुए ऐसे लोक सेवकों के साथ जिन्हें इस संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन अपने कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए आवश्यक समझे, किसी भी समय किसी भी भूमि पर प्रवेश कर सकता है।

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

लेखपाल की नौकरी तथा उनकी पीड़ा

शॉर्टकट एक रोग है

 *परिचय* 
आज के प्रशासनिक तंत्र में कार्यों को जल्दबाजी में पूरा करने की प्रवृत्ति एक गहरी समस्या बन गई है। अधिकारी अपने कर्तव्यों को निभाने की बजाय रैंकिंग और नंबर 1 पोजीशन पाने की होड़ में रहते हैं। इस दौड़ में तेजी लाने के लिए वे लेखपालों पर लगातार दबाव बनाते हैं कि वे अपने कार्यों को यथासंभव शीघ्रता से पूरा करें। इस समस्या का मुख्य असर लेखपालों पर पड़ता है, जो न केवल कई महत्वपूर्ण कार्यों को संभालते हैं, बल्कि उन्हें हमेशा इस डर में जीना पड़ता है कि कहीं उनकी कोई गलती न हो जाए। इस लेख में हम लेखपालों की जिम्मेदारियों, अधिकारियों की शॉर्टकट प्रवृत्ति के दुष्प्रभावों, और इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली समस्याओं का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।


---

 *लेखपालों के विविध कार्य और उन पर बढ़ता दबाव* 

1. *खतौनी में अंश निर्धारण* 
खतौनी में अंश निर्धारण एक अत्यंत संवेदनशील कार्य है, जिसमें भूमि विवादों का निपटारा किया जाता है। यह कार्य केवल गणना का नहीं होता, बल्कि इसमें सभी हितधारकों की सुनवाई और सही रिकॉर्ड अद्यतन करना आवश्यक होता है। अधिकारियों के दबाव के कारण, लेखपालों को यह कार्य जल्दी पूरा करने के लिए कहा जाता है। त्रुटि होने पर विवाद बढ़ जाता है और मामला कोर्ट में पहुँचता है, जिसका पूरा दोष लेखपाल पर थोप दिया जाता है।


2. *वरासत जांच और निस्तारण* 
वरासत का कार्य अत्यधिक जटिल और संवेदनशील होता है, जिसमें मृतक के वास्तविक उत्तराधिकारियों का निर्धारण किया जाता है। यह प्रक्रिया पारिवारिक विवादों के कारण और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। अधिकारियों के जल्दबाजी में काम पूरा करने के दबाव में, लेखपाल कई बार गलत वरासत का रिपोर्ट कर देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कानूनी मुकदमे उठ खड़े होते हैं।


3. *एग्रीस्टेक और खसरा सर्वे* 
भूमि रजिस्टरों का अद्यतन और एग्रीस्टेक आधारित खसरा सर्वे समय-साध्य कार्य हैं। अधिकारियों की रैंकिंग को लेकर चिंता के कारण लेखपालों पर अनावश्यक दबाव बनाया जाता है। जल्दबाजी में सर्वेक्षण में गलतियाँ हो जाती हैं, जिसका सीधा असर योजनाओं और लाभार्थियों पर पड़ता है।


4. *निर्वाचन से संबंधित कार्य* 
चुनावों के दौरान लेखपालों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ आ जाती हैं, जैसे मतदाता सूची का अद्यतन, बूथ व्यवस्था, और चुनावी प्रक्रिया का सही संचालन। सीमित समय में ये कार्य निपटाना मुश्किल होता है, लेकिन अधिकारियों का जोर रहता है कि सब कुछ तय समय पर पूरा दिखे। यदि कोई गड़बड़ी होती है, तो दोष लेखपाल पर ही आता है।


5. *घरौनी निर्माण और वितरण* 
ग्रामीणों को स्वामित्व प्रमाणपत्र (घरौनी) प्रदान करने का कार्य लेखपालों के कंधों पर होता है। अधिकारियों का लक्ष्य होता है कि अधिक से अधिक प्रमाणपत्र वितरित कर आँकड़ों में बढ़ोतरी दिखाई जाए। जल्दबाजी में सर्वेक्षण में गलतियाँ हो जाती हैं, जिसके कारण जनता का आक्रोश लेखपालों पर निकलता है।


6. *आय, जाति, निवास प्रमाणपत्र जारी करना* 
आय, जाति, और निवास प्रमाणपत्रों का सत्यापन और वितरण लेखपालों की जिम्मेदारी होती है। अधिकारियों के दबाव में, कई बार प्रमाणपत्रों का सही सत्यापन नहीं किया जाता, जिससे भविष्य में समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।


7. *IGRS (जन शिकायतों का निस्तारण)*
जन शिकायतों का त्वरित निस्तारण करने का दबाव लेखपालों पर लगातार बना रहता है। अधिकारियों का मुख्य जोर केवल आँकड़ों में सुधार पर होता है, जबकि असली समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता। शिकायतें अक्सर स्थानीय समस्याओं, जैसे भूमि विवाद या सरकारी सेवाओं की कमी से जुड़ी होती हैं। लेखपालों को इनका त्वरित निस्तारण करना होता है ताकि अधिकारी अपनी रैंकिंग में बने रहें।

8. *बेदखली कार्य* 
सरकारी भूमि पर अतिक्रमण की स्थिति में लेखपालों की जिम्मेदारी होती है कि वे उचित प्रक्रिया के तहत बेदखली का कार्य करें। जब भूमाफिया और अन्य शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया जाता है, तो लेखपाल को इसे हटाने के लिए त्वरित कार्रवाई करनी होती है। अधिकारियों के दबाव के कारण, लेखपालों को कई बार बिना तैयारी के ही बेदखली करने जाना पड़ता है।

9. *अन्य विभागीय कार्यों में सहयोग* 
लेखपालों को अपने नियमित कार्यों के अलावा अन्य विभागीय कार्यों में भी सहयोग देना पड़ता है। विभिन्न विभागों से आए निर्देशों के अनुसार, लेखपालों को अपने कार्यों के साथ-साथ अन्य विभागीय कार्यों को भी समय पर निपटाने का दबाव होता है। ये कार्य भी लेखपालों के लिए एक अतिरिक्त चुनौती बन जाते हैं, जो पहले से ही अनेक जिम्मेदारियों का सामना कर रहे होते हैं।


10. *अतिरिक्त हल्का का भार* 
लेखपालों को कई बार विभिन्न हल्कों से भी अतिरिक्त कार्यभार सौंपा जाता है। जब किसी हल्के में कमी होती है या कार्य की आवश्यकता बढ़ जाती है, तो लेखपालों पर कार्य का अतिरिक्त दबाव आ जाता है। कई बार, उन्हें अपने नियमित कार्यों के साथ-साथ नए कार्यों को भी संभालना पड़ता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।




---

 *अधिकारियों की रैंकिंग की होड़ और लेखपालों का शोषण* 

1. *तात्कालिक परिणामों का दबाव:* अधिकारी तात्कालिक परिणामों को प्राथमिकता देते हैं, भले ही इससे दीर्घकालिक समस्याएँ खड़ी हों।


2. *गलतियों का ठीकरा लेखपालों पर:* किसी भी गलती का पूरा दोष लेखपालों पर डाल दिया जाता है, जबकि अधिकारी स्वयं जवाबदेही से बच निकलते हैं।


3. *दंडात्मक कार्रवाई और मानसिक तनाव:* लेखपालों को अक्सर निलंबन, वेतन रोकने, या मुकदमे का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।




---

 *शॉर्टकट मानसिकता से निपटने के उपाय* 

1. *कार्य योजना और समयसीमा का पुनर्निर्धारण:* लेखपालों को उनके कार्यों के लिए पर्याप्त समय और संसाधन दिए जाएँ ताकि वे बिना दबाव के काम कर सकें।


2. *प्रोत्साहन आधारित कार्य प्रणाली:* लेखपालों के प्रयासों की सराहना की जाए और उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए, न कि केवल गलती पर दंडित किया जाए।


3. *अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना:* कार्य में गड़बड़ी होने पर केवल लेखपालों को दोषी न ठहराकर अधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराया जाए।


4. *मानसिक स्वास्थ्य और कार्य-जीवन संतुलन:* लेखपालों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और उन्हें तनावमुक्त कार्य वातावरण प्रदान किया जाए।




निष्कर्ष

शॉर्टकट प्रवृत्ति प्रशासनिक तंत्र के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसमें अधिकारियों की रैंकिंग की होड़ का खामियाजा लेखपालों को भुगतना पड़ता है। जल्दबाजी में किए गए कार्यों में गलतियाँ स्वाभाविक हैं, लेकिन इनका पूरा दंड लेखपालों पर डाल दिया जाता है। उनके ऊपर न केवल नियमित जिम्मेदारियों का बोझ होता है, बल्कि अन्य विभागीय कार्यों में भी सहयोग करना पड़ता है। यदि प्रशासन को पारदर्शी और न्यायपूर्ण बनाना है, तो शॉर्टकट प्रवृत्ति को समाप्त कर दीर्घकालिक दृष्टिकोण से योजनाबद्ध कार्य प्रणाली अपनानी होगी। इससे न केवल कार्यों की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि लेखपालों के साथ भी न्याय सुनिश्चित होगा।

इस प्रकार, यह आवश्यक है कि हम इस समस्या की जड़ को समझें और सभी स्तरों पर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाएँ। एक स्वस्थ कार्य वातावरण सुनिश्चित करने से न केवल लेखपालों की कार्य क्षमता में सुधार होगा, बल्कि संपूर्ण प्रशासनिक तंत्र की प्रभावशीलता भी बढ़ेगी।


---

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता अध्याय 2

राजस्व संहिता 2006 अध्याय-दो



राजस्व मण्डल

में राज्य का राजस्व क्षेत्रों में विभाजन-इस संहिता के प्रयोजनों के लिए, राज्य को राजस्व क्षेत्रों में विभाजित किया जाएगा जो मंडलों में विभक्त होगा जिसमें दो या अधिक ज़िले हो सकेंगे और प्रत्येक ज़िला में दो या अधिक तहसीलें हो सकेंगी और प्रत्येक तहसील में एक या अधिक परगनें हो सकेंगे और प्रत्येक परगना में दो या इससे अधिक गांव हो सकेंगे।  

राजस्व क्षेत्रों का गठन

(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा निम्नलिखित को विनिर्दिष्ट कर सकती है।

(एक) उन जिलों को जिनसे मिलकर कोई मण्डल बनता हो; (दो) उन तहसीलों को जिनसे मिलकर कोई ज़िला बनता हो;

(तीन) उन गांवों को जिनसे मिलकर कोई तहसील बनती हो।

(2) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी राजस्व क्षेत्र की सीमाओं को समामेलित, पुनःसमायोजित, विभाजित करके या किसी अन्य रीति से, वह चाहे जो भी हो, परिवर्तित कर सकती है या किसी ऐसे राजस्व क्षेत्र को समाप्त कर सकती है और किसी ऐसे राजस्व क्षेत्र का नामकरण कर सकती है

और उसके नाम में परिवर्तन कर सकती है और यदि जहाँ किसी क्षेत्र का पुनः नामकरण कर दिया जाए, तो वहाँ उक्त क्षेत्र के किसी विधि या लिखत या अन्य दस्तावेज में उसके मौलिक नाम से किए गए निर्देशों को, जब तक कि अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित न किया जाए, पुन: नामकरण किए गए क्षेत्र का निर्देश समझा जाएगा :

परन्तु किसी राजस्व क्षेत्र की सीमाओं को परिवर्तित करने के किसी प्रस्ताव पर इस उपधारा के अधीन कोई आदेश पारित करने के पूर्व राज्य सरकार आपत्तियाँ आमंत्रित करने के लिए ऐसे प्रस्तावों को विहित रूप से प्रकाशित करेगी और ऐसे प्रस्तावों के सम्बन्ध में की गई आपत्तियों पर विचार करेगी।

(3) कलेक्टर विहित रूप में प्रकाशित किसी आदेश द्वारा तहसील के गांवों को लेखपाल हलकों में और लेखपाल हलकों को राजस्व निरीक्षक हलकों में व्यवस्थित करेगा और प्रत्येक राजस्व निरीक्षक के मुख्यालय को भी उसके हल्के के भीतर विनिर्दिष्ट करेगा।

(4) इस संहिता के प्रारम्भ होने के समय यथा विद्यमान मण्डल, ज़िले, तहसील, परगने, राजस्व निरीक्षक हलके, लेखपाल हलके और गांव, जब तक कि पूर्ववर्ती उपखण्डों में उनमें कोई परिवर्तन न कर दिया जाए, इस धारा के अधीन विनिर्दिष्ट राजस्व क्षेत्र समझे जायेंगे।


सोमवार, 23 मई 2022

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 221

निरीक्षण करने और प्रतिलिपियां प्राप्त करने का अधिकार- इरा राहिता या तदधीन बनायी गयी नियमावली के अधीन तैयार किए गए या रखे गए सभी दस्तावेज, विवरण अभिलेख और रजिस्टर ऐसे समय और ऐसी शर्तों के अधीन और ऐसी फीस के भुगतान जैसी विहित की जाय, पर निरीक्षण के लिए उपलब्ध रहेंगे और कोई भी व्यक्ति विहित फीस का भुगतान करने पर ऐसे दस्तावेज, विवरण, अभिलेख या रजिस्टर की या ऐसे दस्तावेज के किसी भाग की सत्यापित प्रतिलिपि प्राप्त करने का हकदार होगा।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 219

प्रत्यायोजन - राज्य सरकार परिषद को या अपने अधीनस्थ किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी को नियमावली बनाने की शक्ति से भिन्न इस संहिता के अधीन प्रदत्त किन्हीं शक्तियों को अधिसूचना द्वारा, प्रत्यायोजित कर सकती है जिनका प्रयोग ऐसी निबन्धनों और शर्तो, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जायें, के अधीन किया जायेगा।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 218


संहिता के उपबन्धों से छूट देने की शक्ति राज्य सरकार अपने द्वारा या केन्द्रीय सरकार द्वारा या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा स्वामित्व में रखे गए किसी भूमि को इस संहिता के सभी या किसी उपबन्ध के लागू होने से अधिसूचना द्वारा छूट प्रदान कर सकती है और इसी प्रकार किसी अधिसूचना को रद्द या उपान्तरित कर सकती है।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 228

सीमा चिन्हों के नाश आदि के लिए नुकसानी- 
(1) यदि कोई व्यक्ति अध्याय चार के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन विधिपूर्वक परिनिर्मित किसी सीमा चिन्ह को जान बूझकर नष्ट करता है या क्षति पहुँचाता है या विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना हटाता है तो उसे तहसीलदार द्वारा इस प्रकार नष्ट किये गये, क्षति पहुँचाये गये या हटाये गये प्रत्येक सीमा चिन्ह के लिये एक हजार रुपये से अनधिक की ऐसी धनराशि जो तहसीलदार की राय में इसे पुनःस्थापित करने के व्यय को पूरा करने और इतला करने वाले को पुरस्कार देंगे, यदि कोई हो, के लिए आवश्यक हो, का भुगतान करने का आदेश दिया जा सकता है।

(2) उपधारा (1) के अधीन नुकशानी की दूराली, भारतीय दण्ड संहिता के अधीन ऐरो नाश क्षति या हटाने के संबंध में किये गये किसी अपराध के लिये अभियोजन से विवर्जित नहीं करेगी।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 227

सीमा चिन्हों के नाश आदि के लिए नुकसानी- (1) यदि कोई व्यक्ति अध्याय चार के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन विधिपूर्वक परिनिर्मित किसी सीमा चिन्ह को जान बूझकर नष्ट करता है या क्षति पहुँचाता है या विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना हटाता है तो उसे तहसीलदार द्वारा इस प्रकार नष्ट किये गये, क्षति पहुँचाये गये या हटाये गये प्रत्येक सीमा चिन्ह के लिये एक हजार रुपये से अनधिक की ऐसी धनराशि जो तहसीलदार की राय में इसे पुनःस्थापित करने के व्यय को पूरा करने और इतला करने वाले को पुरस्कार देंगे, यदि कोई हो, के लिए आवश्यक हो, का भुगतान करने का आदेश दिया जा सकता है।

(2) उपधारा (1) के अधीन नुकशानी की दूराली, भारतीय दण्ड संहिता के अधीन ऐरो नाश क्षति या हटाने के संबंध में किये गये किसी अपराध के लिये अभियोजन से विवर्जित नहीं करेगी।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 239

अध्याय-सोलह

निरसन और अपवाद

230 निरसन (1) प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमन एतद्वारा निरसित किए जाते हैं। (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी ऐसे अधिनियमन के निरसन से निम्नलिखित पर प्रभाव नहीं पडेगा

(क) उत्तराखण्ड राज्य में ऐसे किसी अधिनियमन के लागू रहने पर: (ख) किसी अधिनियमन के पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक रूप से की गयी या सहन की गयी किसी बात पर या

(ग) कोई अन्य अधिनियमन जिसमें ऐसा अधिनियमन उपयोजित राम्मिलित या निर्दिष्ट किया गया हो या

(घ) पहले से कुछ भी किए गए या सहन किए गए कार्य की विधिमान्यता, अविधिमान्यता प्रभाव या परिणाग या पहले से अर्जित प्रोदभूत या उपगत कोई अधिकार, हक या बाध्यता या दायित्व जिसमें विशेष रूप से सभी परिसम्पत्तियों को राज्य में निहित करना और इसमें सभी मध्यवर्तियों के सभी अधिकार, हक और हित को समाप्त करना सम्मिलित है; या इसके सम्बन्ध में कोई उपवार या कार्यवाही, या किसी ऋण का या से निबन या उन्मोवन, शास्ति, बाध्यता, दायित्व, दावा या मांग, या पहले से स्वीकृत कोई क्षतिपूर्ति या विगत में किए गए किसी कार्य या वस्तु का सबूत या

(ङ) विधि का कोई सिद्धान्त, नियम या स्थापित अधिकारिता, अभिवचन का रूप या माध्यम प्रथा या प्रक्रिया या विद्यमान उपयोग, रूदि, विशेषाधिकार निर्बन्धन, छूट, पद या नियुक्तिः

परन्तु किसी ऐसे अधिनियम के अधीन किसी कृत, कार्य या कार्यवाही को जिसमें बनाया गया कोई नियम, नियम संग्रह, निर्धारण, नियुक्तियाँ एवं अन्तरण जारी की गयी अधिसूचनाएं, सम्मन, नोटिस, चारण्ट और उद्घोषणा, प्रदत्त शक्ति, दिया गया पट्टा, नियम सीमा विन्ह, तैयार किया गया अधिकार अभिलेख और अन्य अभिलेख अर्जित अधिकार और उपगत दायित्व भी सम्मिलित है, जहाँ तक वे इस संहिता के उपबन्धों से असंगत न हो, इस संहिता के तदनुरूप उपबन्धों के अधीन कृत कार्य या कार्यवाही समझा जायेगा और तदनुसार प्रवृत्त बना रहेगा जब तक कि इरा रांहिता के अधीन कृत किसी कार्य या कार्यवाही से अधिक्रगित न हो जाय।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 230

 निरसन (1) प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमन एतद्वारा निरसित किए जाते हैं। (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी ऐसे अधिनियमन के निरसन से निम्नलिखित पर प्रभाव नहीं पडेगा

(क) उत्तराखण्ड राज्य में ऐसे किसी अधिनियमन के लागू रहने पर: (ख) किसी अधिनियमन के पूर्व प्रवर्तन या उसके अधीन सम्यक रूप से की गयी या सहन की गयी किसी बात पर या

(ग) कोई अन्य अधिनियमन जिसमें ऐसा अधिनियमन उपयोजित राम्मिलित या निर्दिष्ट किया गया हो या

(घ) पहले से कुछ भी किए गए या सहन किए गए कार्य की विधिमान्यता, अविधिमान्यता प्रभाव या परिणाग या पहले से अर्जित प्रोदभूत या उपगत कोई अधिकार, हक या बाध्यता या दायित्व जिसमें विशेष रूप से सभी परिसम्पत्तियों को राज्य में निहित करना और इसमें सभी मध्यवर्तियों के सभी अधिकार, हक और हित को समाप्त करना सम्मिलित है; या इसके सम्बन्ध में कोई उपवार या कार्यवाही, या किसी ऋण का या से निबन या उन्मोवन, शास्ति, बाध्यता, दायित्व, दावा या मांग, या पहले से स्वीकृत कोई क्षतिपूर्ति या विगत में किए गए किसी कार्य या वस्तु का सबूत या

(ङ) विधि का कोई सिद्धान्त, नियम या स्थापित अधिकारिता, अभिवचन का रूप या माध्यम प्रथा या प्रक्रिया या विद्यमान उपयोग, रूदि, विशेषाधिकार निर्बन्धन, छूट, पद या नियुक्तिः

परन्तु किसी ऐसे अधिनियम के अधीन किसी कृत, कार्य या कार्यवाही को जिसमें बनाया गया कोई नियम, नियम संग्रह, निर्धारण, नियुक्तियाँ एवं अन्तरण जारी की गयी अधिसूचनाएं, सम्मन, नोटिस, चारण्ट और उद्घोषणा, प्रदत्त शक्ति, दिया गया पट्टा, नियम सीमा विन्ह, तैयार किया गया अधिकार अभिलेख और अन्य अभिलेख अर्जित अधिकार और उपगत दायित्व भी सम्मिलित है, जहाँ तक वे इस संहिता के उपबन्धों से असंगत न हो, इस संहिता के तदनुरूप उपबन्धों के अधीन कृत कार्य या कार्यवाही समझा जायेगा और तदनुसार प्रवृत्त बना रहेगा जब तक कि इरा रांहिता के अधीन कृत किसी कार्य या कार्यवाही से अधिक्रगित न हो जाय।

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता अध्याय 1

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006

(उ0प्र0 अधिनियम सं0 8, सन् 2012) (उ0प्र0 अध्यादेश सं0 4 सन् 2015 के द्वारा यथासंशोधित)


संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-

(1) यह अधिनियम उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 कहा जाएगा।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में होगा।


(3) यह ऐसे दिनांक को प्रवृत्त होगा जैसा राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे और विभिन्न क्षेत्रों के लिए या इस संहिता के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न दिनांक नियत किये जा सकते हैं। संहिता का लागू होना- इस संहिता के उपबन्ध, अध्याय आठ और नौ को छोड़कर, संपूर्ण उत्तर प्रदेश में लागू होंगे और अध्याय आठ और नौ ऐसे क्षेत्रों में लागू होंगे जिन पर प्रथम अनुसूची के क्रम संख्या 19 और 25 पर विनिर्दिष्ट कोई अधिनियम इस संहिता द्वारा उनके निरसन के ठीक पूर्ववर्ती दिनांक को लागू था। संहिता का नए क्षेत्रों में विस्तार- (1) जहाँ इस संहिता के प्रारम्भ होने के पश्चात उत्तर प्रदेश के राज्य क्षेत्र में कोई क्षेत्र सम्मिलित किया जाए, वहाँ राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा ऐसे क्षेत्र में इस संहिता का संपूर्ण या कोई उपबन्ध विस्तारित कर सकती है।

(2) जहाँ उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की जाए, वहाँ उक्त उपधारा में विनिर्दिष्ट क्षेत्र में प्रवृत्त किसी अधिनियम, नियम या विनियम के उपबन्ध जो इस प्रकार लागू किए गये उपबन्धों से असंगत हो, निरसित हुए समझे जायेगें।

(3) राज्य सरकार किसी पश्चातवर्ती अधिसूचना द्वारा उपधारा (1) के अधीन जारी किसी अधिसूचना में संशोधन, उपान्तरण या परिवर्तन कर सकती है। परिभाषाएँ- इस संहिता में :

(1) आबादी" या "ग्रामीण आबादी' का तात्पर्य किसी ग्राम के ऐसे क्षेत्र से है जिसका उपयोग इस संहिता के प्रारम्भ होने के दिनांक को उसके निवासियों के आवास के प्रयोजनों के लिए या उसके सहायक प्रयोजनों यथा, सहन व हरे वृक्षों, कुआँ आदि के लिए किया जा रहा हो या जिसे एतद्पश्चात ऐसे प्रयोजन के लिए आरक्षित किया गया हो या किया जाए ;

(2) "कृषि' के अन्तर्गत बागवानी, पशुपालन, मत्स्य पालन, फूलों की खेती, मधुमक्खी पालन और कुक्कुट पालन भी है ;


(3) “कृषि श्रमिक' का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसकी जीविका का मुख्य स्त्रोत कृषि भूमि पर शारीरिक श्रम है ;


(4) "बैंक" का तात्पर्य वही होगा जो उत्तर प्रदेश साहूकारी विनियमन अधिनियम, 1976 में उसके लिये दिया गया है:


(5) "भूमि प्रबन्धक समिति' का तात्पर्य उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 28-क के अधीन गठित किसी भूमि प्रबन्धक समिति से है ;


(6) "परिषद" का तात्पर्य धारा 7 के अधीन गठित या गठित समझे जाने वाले राजस्व परिषद से है ;


(7) "पूर्त संस्था” का तात्पर्य किसी पूर्त प्रयोजन के लिये गठित किसी अधिष्ठान, उपक्रम, संगठन या संघ से है और उसके अन्तर्गत कोई विनिर्दिष्ट विन्यास भी है;


(8) "कलेक्टर" का तात्पर्य धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा इस रूप में नियुक्त किसी अधिकारी से है और उसके अन्तर्गत निम्नलिखित भी होंगे,


(क) उक्त धारा की उपधारा (2) के अधीन राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कोई अपर कलेक्टर ; और


(ख) इस संहिता के अधीन कलेक्टर के सभी या किन्हीं कृत्यों का निष्पादन करने के लिये राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा, सशक्त प्रथम श्रेणी का असिस्टेन्ट कलेक्टर ;

 (9) "संचित गांव निधि' का तात्पर्य धारा 69 के अधीन गठित संचित गांव निधि से है ;


(10) किसी भू-खातेदार के सम्बन्ध में "परिवार" का तात्पर्य यथास्थिति स्वयं पुरूष या स्त्री और उसकी पत्नी या उसका पति (न्यायिक रूप से पृथक पत्नी या पति से भिन्न) अवयस्क पुत्रों, और विवाहित पुत्रियों से भिन्न अवयस्क पुत्रियों से है :


परन्तु जहाँ प्रश्न किसी भूमि के अन्तरण से सम्बन्धित हो और अन्तरिती अवयस्क हो वहाँ पद "परिवार" के अन्तर्गत ऐसे अवयस्क के माता-पिता होंगे;


(11) "बाग-भूमि” का तात्पर्य किसी जोत में भूमि के किसी विनिर्दिष्ट भाग से है जिसमें इस प्रकार वृक्ष लगे हों (जिसमें पपीता या केला के पौधे सम्मिलित नहीं हैं) कि वे किसी भूमि को या उसके किसी समुचित भाग को किसी अन्य प्रयोजन के लिये उपयोग में लाए जाने से रोकते हों, या पूर्ण रूप से विकसित होने पर रोकेंगे और ऐसी भूमि पर लगे वृक्ष एक बाग का रूप धारण करेंगे ;


(12) "जोत" का तात्पर्य एक भू-खातेदारी, एक पट्टे, वचनबद्ध या अनुदान के अधीन रखे गये भूमि के किसी खण्ड से है ;


(13) किसी जोत के सम्बन्ध में "सुधार" का तात्पर्य ऐसे किसी संकर्म से है जिससे जोत के मूल्य में भौतिक रूप से अभिवृद्धि होती हो और जो उसके लिए उपयुक्त हो और उस प्रयोजन के सुसंगत हो जिस हेतु उसे रखा गया हो और जो यदि जोत पर निष्पादित न किया जाए, उसके लाभ के लिए या तो प्रत्यक्ष रूप से  सम्पादित किया जाता हो या सम्पादन के पश्चात उसके लिए प्रत्यक्ष रूप से लाभप्रद बनाया जाता हो और पूर्ववर्ती उपबन्धों के अधीन उसके अन्तर्गत निम्नलिखित संकर्म भी हैं

(एक) कृषि प्रयोजनों के लिये जल के भण्डारण, आपूर्ति या वितरण के लिए तालाबों, कुओं, जल-प्रणालियों, तटबन्धों का निर्माण और अन्य कार्य ;

(दो) भूमि के जल-निकास हेतु या बाढ़ से या जल से भूमि के कटाव या अन्य क्षति से भूमि की रक्षा हेतु निर्माण कार्य ;

(तीन) वृक्षारोपण करना, भूमि को कृषि योग्य बनाना, घेराबन्दी करना, समतल अथवा सीढ़ीदार बनाना;

(चार) आबादी या नगरीय क्षेत्र को छोड़कर अन्यत्र जोत के आस-पास जोत के सुविधाजनक या लाभप्रद उपयोग या अध्यासन के लिए आवश्यक भवनों का निर्माण ; और

(पाँच) पूर्वोक्त संकर्मो में से किसी संकर्म का नवीकरण या पुनर्निर्माण या उसमें परिवर्तन या उसका परिवर्धन ;

(14) "भूमि" का तात्पर्य, अध्याय सात और आठ और धारा 80, 81 और धारा 136 के सिवाय, ऐसी भूमि से है जो कृषि से सम्बद्ध प्रयोजनों के लिये धृत या अध्यासित हो ;

(15) "भूमि धारक” का तात्पर्य, ऐसे व्यक्ति से है जिसे लगान देय हो या देय होती यदि कोई स्पष्ट या विवक्षित संविदा न होती ;

(16) "राजस्व न्यायालय” का तात्पर्य, निम्नलिखित प्राधिकारियों में से सभी या किसी प्राधिकारी, (नामस्वरूप) परिषद और उसके सभी सदस्य, आयुक्त, अपर आयुक्त, कलेक्टर, अपर कलेक्टर, मुख्य राजस्व अधिकारी, असिस्टेन्ट कलेक्टर, बन्दोबस्त अधिकारी, सहायक बन्दोबस्त अधिकारी, अभिलेख अधिकारी, सहायक अभिलेख अधिकारी, तहसीलदार, तहसीलदार (न्यायिक) और नायब तहसीलदार से है ; 

(17) “राजस्व अधिकारी" का तात्पर्य आयुक्त, अपर आयुक्त, कलेक्टर, अपर कलेक्टर, मुख्य राजस्व अधिकारी, उप जिलाधिकारी, सहायक कलेक्टर, बन्दोबस्त अधिकारी, सहायक बन्दोबस्त अधिकारी, अभिलेख अधिकारी, सहायक अभिलेख अधिकारी, तहसीलदार, तहसीलदार (न्यायिक), नायब तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक से है ;

(18) "उप जिलाधिकारी" का तात्पर्य, तहसील के प्रभारी असिस्टेन्ट कलेक्टर से है ;

(19) "टौंगिया रोपवनी' का तात्पर्य, ऐसी वनरोपण प्रणाली से है जिसके पहले चरण में वृक्षारोपण कृषि फसल के उगाने के साथ-साथ किया जाता है जिसमें फसल का विकास इस प्रकार रोपित वृक्षों द्वारा फैलाव बनाने पर रूक जाता है जिससे कृषि फसल की खेती असंभव हो जाती है ; 

(20) "गांवका तात्पर्य, किसी ऐसे स्थानीय क्षेत्र से है, जो चाहे घना हो या नहीं, तत्सम्बन्धी जिले के राजस्व अभिलेख में गांव के रूप में अभिलिखित हो और उसके अन्तर्गत ऐसा क्षेत्र भी है जिसे राज्य सरकार सामान्य या विशेष अधिसूचना द्वारा गांव के रूप में घोषित करे ;

(21) "गांव शिल्पी' का तात्पर्य, ऐसे व्यक्ति से है जिसकी जीविका का मुख्य स्त्रोत कृषि या उसके आनुषंगिक प्रयोजनों के लिये प्रयोग में लाए जाने वाले परम्परागत औजारों-उपकरणों और अन्य सामानों या वस्तुओं का निर्माण या मरम्मत है और उसके अन्तर्गत बढ़ई, बुनकर, कुम्हार, लोहार, रजतकार, सुनार, नाई, धोबी, मोची या ऐसा कोई अन्य व्यक्ति भी है जो सामान्यतः किसी गांव में अपने परिश्रम से या अपने परिवार के किसी सदस्य के परिश्रम से शिल्पकारी करके अपनी जीविका का अर्जन करता है ; 

(22) शब्द और पद "गांव निधि", "ग्राम सभा” और “ग्राम पंचायत" के वही अर्थ होंगे जो उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 में उनके लिए दिए गये हैं; 

(23) 'कृषि वर्ष' का तात्पर्य ऐसे वर्ष से है जो कैलेण्डर वर्ष में जुलाई के प्रथम दिन से आरम्भ होकर जून के तीसवें दिन पर समाप्त होता है। इसे ‘फसली वर्ष' भी कहा जाता है; 

(24) 'मध्यवर्ती का तात्पर्य, जब उसका सम्बन्ध किसी आस्थान से हो, उक्त आस्थान या उसके किसी भाग के स्वामी, मातहतदार, अदना मालिक, ठेकेदार, अवध के पट्टेदार दवामी या इस्तमरारी और दवामी काश्तकार से है; 

(25) ‘पट्टा' के अन्तर्गत, जब उसका सम्बन्ध खानों या खनिज पदार्थों से हो, शिकमी पट्टा, अन्वेषण पट्टा

और पट्टा देने या शिकमी उठाने के अनुबन्ध भी हैं और ‘पट्टेदार' की भी व्याख्या तद्नुसार ही की जाएगी; 

(26) 'डिक्री' का वही अर्थ होगा, जो सिविल प्रकिया संहिता, 1908 (अधिनियम संख्या 5, सन् 1908) की धारा 2 में इसके लिए समनुदेशित है; 

(27) 'राज्य सरकार का तात्पर्य उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार से है; 

(28) 'केन्द्रीय सरकार' का अर्थ होगा, जो साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (अधिनियम संख्या 10, सन् 1897) की धारा 3 में इसके लिए समनुदेशित है; 

 (29) 'मिनजुमला संख्या का तात्पर्य सैद्धान्तिक रूप से विभाजित लेकिन भौतिक रूप से अविभाजित खेत के जुज भाग को इंगित करने वाली 'शजरा संख्या' से है।

रविवार, 28 नवंबर 2021

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 103

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 103 इस संहिता के उल्लंघन में पट्टे का प्रभाव - जहां धारा 94 धारा 95 धारा 96 या धारा 99 के उल्लंघन में किसी भूमिधर ने अपनी किसी जोत या उसके किसी भाग को पट्टे पर दे दिया हो वहां किसी विधि या संविदा या पट्टा विलेख में दी गयी किसी बात के होते हुए भी, (क) जहां अपने परिवार द्वारा धृत भूमि के साथ पट्टेदार द्वारा धृत भूमि जिसमें कि उसको और उसके परिवार के किसी सदस्य को पट्टे पर दी गयी भूमि सम्मिलित है, का कुल क्षेत्रफल उत्तर प्रदेश में 5. 0586 हेक्टेयर से अधिक न हो तो वहां पट्टेदार उस पर असंक्रमणीय अधिकारों सहित भूमिधर हो जाएगा और समझा जायेगा और (ख) जहां कुल क्षेत्रफल, जैसा ऊपर वर्णित है, 5.0586 हेक्टेयर से अधिक है, वहां पट्टेदार उसका क्रेता हो जाएगा और समझा जायेगा और उस पर धारा 89 के उपबन्ध लागू होंगे।

सोमवार, 25 मार्च 2019

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 54

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 54

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 53

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 53

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 52

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 52

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 51

सोमवार, 6 अगस्त 2018

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2016 धारा 50

अधिकार अभिलेख को अन्तिम रूप देना- धारा 49 के अनुसार मानचित्र या अभिलेख का पुनरीक्षण करने के पश्चात् सहायक अभिलेख अधिकारी अपने दिनांक युक्त हस्ताक्षर से अधिकार अभिलेख (खतौनी) की पुष्टि करेगा या उसमें संशोधन करेगा।।

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2016 धारा 49

मानचित्र और अभिल ेख क े पुनरीक्षण की प्रक्रिया- (1) धारा 46 और 47 क े अधीन मानचित्र और अभिलेख का पुनरीक्षण करन े के लिय े अभिलेख अधिकारी उपधारा (2) स े (8) क े उपबन्धा ें के अधीन रहते हुए विहित प्रक्रिया के अनुसार सर्वेक्षण, मानचित्र में स ुधार, खेतवार पड़ताल और चालू अधिकार अभिलेख (खतौनी) का परीक्षण और सत्यापन करायेगा। (2) चालू अधिकार अभिलेख का परीक्षण और सत्यापन हो जाने क े पश्चात् नायब तहसीलदार ऐस े अभिल ेख में लेखन सम्बन्धी भूलों और गलतिया ें को, यदि कोई हो, शुद्ध करेगा और स ंबद्ध खातेदारो ं और अन्य हितबद्ध व्यक्तियों को नोटिस जारी कराय ेगा जिसमे ं चालू अधिकार अभिलेख और ऐस े अन्य अभिलेख स े, जो विहित किया जाए, स ुस ंगत उद्धरण दिए जायेंगे, जिसम ें भूमि के सम्बन्ध में उनक े अधिकार और दायित्व और उपधारा (1) म ें उल्लिखित क्रियाओं क े दौरान उनमें पायी गयी भ ूला ें और विवादों का उल्ल ेख किया जाय ेगा। (3) कोई व्यक्ति जिस े उपधारा (2) क े अधीन ना ेटिस जारी की गयी हो, नोटिस की प्राप्ति क े दिनांक स े इक्कीस दिन क े भीतर नायब तहसीलदार के समक्ष उसके सम्बन्ध में आपत्तियां प्रस्तुत कर सकता है, जिसम ें ऐस े अभिलेख या उद्धरण की प्रविष्टियों की शुद्धता या उसके प्रकार पर विवाद प्रकट किया गया हो। (4) भूमि म ें हितबद्ध कोई व्यक्ति उपधारा (5) के अनुसार विवाद क े तय किय े जान े के पूर्व किसी समय नायब तहसीदार के समक्ष या उपधारा (6) के अनुसार आपत्तियों का विनिश्चय किए जाने के पूर्व किसी समय सहायक अभिलेख अधिकारी के समक्ष आपत्ति प्रस्तुत कर सकता है। (5) नायब तहसीलदार - (क) जहा ं उपधारा (3) और उपधारा (4) के अनुसार आपत्तियां प्रस्तुत की जायं, वहाँ सम्बद्ध पक्षकारा ें को स ुनवाई करने के पश्चात; और (ख) किसी अन्य स्थिति म ें, ऐसी जाँच करन े के पश्चात, जिस े वह आवश्यक समझ े; भ ूल का स ुधार कर ेगा और अपने समक्ष उपस्थित हा ेन े वाले पक्षकारों के बीच समझौता द्वारा विवाद का निपटारा कर ेगा और ऐस े समझौत े क े आधार पर आदेश देगा। (6) ऐस े समस्त मामलों का अभिलेख, जिनका निस्तारण, नायब तहसीलदार द्वारा उपधारा (5) की अपेक्षानुसार, समझौता द्वारा नहीं किया जा सकता, सहायक अभिलेख अधिकारी को भ ेज दिया जाएगा जो उनका निस्तारण धारा 24 में निर्धारित प्रक्रिया क े अनुसार करेगा, और जहाँ विवाद में हक का प्रश्न अन्तर्गस्त हो वहाँ वह उसका विनिश्चय सरसरी तौर पर जाँच करन े के पश्चात करेगा। (7) जहा ँ उपधारा (6) के अधीन सरसरी तौर पर जाँच करने क े पश्चात सहायक अभिलेख अधिकारी का समाधान हा े जाए कि विवादग्रस्त भूमि राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी की है, वहाँ ऐसी भ ूमि पर अप्राधिकृत अध्यासन रखने वाले व्यक्ति का े बेदखल करायेगा और इस प्रयोजन के लिये ऐस े बल का प्रयोग कर सकता है या करा सकता है जो आवश्यक हो। (8) उपधारा (6) या उपधारा (7) के अधीन सहायक अभिलेख अधिकारी द्वारा दिये गये किसी आद ेश स े व्यथित कोई व्यक्ति ऐस े आदेश के दिन ंाक स े तीस दिन क े भीतर, विहित रीति स े अभिलेख अधिकारी का े अपील कर सकता है, और अभिलेख अधिकारी का ए ेसी अपील पर प्रत्येक आदेश, धारा-210 के उपबन्धो के अधीन रहते हुए अंतिम होगा।

Featured post

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता 2006 धारा 206

अतिक्रमण आदि के लिए शास्ति (1) कोई व्यक्ति जो (क) गांव की किसी सार्वजनिक सड़क (चकरोड सहित ), पथ या सामान्य भूमि का अतिक्रमण करता है या उसके ...